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आज फिर कान में
वो शोर गुंजा
आज फिर तेरे लिखे
ख़तों को मैंने जब छुआ
खामोशी से भरे लम्हे
आज फिर मैंने सुने
बेशक़ कान में
फिर वो शोर गुंजा

स्मृति से

Smritee Sharma Puri