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छोटा पर्दा और बड़ा पर्दा एक ही सिक्के के दो पहलू : मुकुल देव

By  Film Wale

डिस्कवरी जीत के शो ‘21 सरफरोश: सारागढ़ी 1897’ में गुल बादशाह के किरदार में मुकुल देव दर्शकों का खूब मनोरंजन कर रहे हैं। एक खास चर्चा के दौरान इस एक्टर ने हमें बताया कि उन्होंने छोटे पर्दे पर वापसी के लिए ‘21 सरफरोश: सारागढ़ी 1897’ को ही क्यों चुना, साथ ही इस किरदार के लिए अपनी तैयारियों के बारे में बताया और अपने भाई राहुल देव से अपने रिश्तों पर भी बात की।

आपने ‘21 सरफरोश: सारागढ़ी 1897’ को क्यों चुना? इतने वर्षों बाद आपको छोटे पर्दे पर वापसी की जरूरत क्यों महसूस हुई?

मैं साल 2006 से छोटे पर्दे पर काम कर रहा हूं जब मैंने एक नॉन-फिक्शन शो होस्ट किया था। दरअसल मैं भारत में इस शो का पहला आधिकारिक होस्ट था। इसके बाद मैं अलग-अलग फिल्मों की शूटिंग में व्यस्त हो गया जिनमें हिन्दी, पंजाबी, तेलुगु, कन्नड और बंगाली फिल्में शामिल हैं। मुझे किसी ऐसे प्रोजेक्ट की तलाश थी जो आज के दौर में प्रासंगिक हो और टीवी पर दिखाई जा रहे तमाम शोज़ से अलग हो। जब मुझे डिस्कवरी की ओर से प्रस्ताव मिला कि वे फिक्शन कार्यक्रमों में भी प्रवेश करने जा रहे हैं तो मुझे यकीन था कि मेरी शंकाओं का भी पूरा ध्यान रखा जाएगा। निश्चित रूप से सारागढ़ी का युद्ध हमारे इतिहास की एक बड़ी घटना है इसलिए मैंने ‘21 सरफरोश: सारागढ़ी 1897’ के लिए फौरन हां कह दी।

क्या आपको लगता है कि भारतीय सैन्य बलों का शौर्य दिखाने वाले और भी शोज़ बनाए जाने चाहिए?

मुझे पता नहीं कि डिस्कवरी जीत भारतीय सैन्य बलों को लेकर और भी शोज़ बना रहा है या नहीं? लेकिन ‘21 सरफरोश: सारागढ़ी 1897’ निश्चित रूप से दर्शकों को अपील करेगा।

गुल बादशाह का रोल निभाने में कितनी रिसर्च करनी पड़ी?

शो की शूटिंग शुरू करने से पहले हमने बहुत रिसर्च की। गुल बादशाह का मेरा किरदार दरअसल एक आदिवासी पशतून सरदार का है, जो अपने जैसे 15-20 लोगों को इकट्ठा करके लॉकहार्ट (अब पाकिस्तान का खैबर पखतूनख्वा) में तैनात 21 सिख रेजीमेंट के खिलाफ 10,000 अफगानी लोगों की एक सेना तैयार करता है। इसे लेकर क्रिएटिव टीम ने बेहद सराहनीय काम किया है। चूंकि इस किरदार में लंबे बाल, दाढ़ी और अफगानी अंदाज जरूरी था, इसलिए मैंने इसकी खासी तैयारी की ताकि मैं इस किरदार के साथ न्याय कर सकूं। इसके लिए स्थानीय बोली भी सही होना जरूरी था क्योंकि मेरा किरदार पशतून भाषा में बात करता है। मैंने इसमें अलग-अलग लोगों की मदद ली।

चूंकि आप इसमें प्रतिद्वंद्वी बने हैं तो क्या आपने इसके लिए अपने भाई राहुल देव से कुछ टिप्स लिए जो बहुत से निगेटिव किरदार निभा चुके हैं?

राहुल और मैंने एक खास किरदार निभाने के दौरान आई चुनौतियों को लेकर अपने-अपने अनुभवों पर चर्चा जरूर की थी। हालांकि मेरे इस किरदार के लिए मैंने अपने पिता की मदद ली क्योंकि उन्हें पशतून और फारसी बोलना आता है और उन्होंने मेरा उच्चारण सुधारने में मदद की।

फिल्म वीरा के बाद आप दोनों भाई एक साथ बड़े पर्दे पर नजर नहीं आए। क्या आप साथ मिलकर कोई अन्य प्रोजेक्ट या कंपनी शुरू करना चाहेंगे?

मुझे अपने भाई के साथ प्रोजेक्ट शुरू करके खुशी होगी क्योंकि हम दोनों के बीच एक खास रिश्ता है।

आप आखिरी बार छोटे पर्दे पर एक होस्ट के रूप में नजर आए थे। तब से लेकर अब तक, आपने टीवी इंडस्ट्री में क्या बदलाव महसूस किया? ये बदलाव अच्छा है या बुरा?

देखिए, छोटा पर्दा और बड़ा पर्दा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। मेरा मतलब है आज हम छोटे पर्दे में भी वही टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रहे हैं जो बड़े पर्दे के लिए होती है। ‘21 सरफरोश : सारागढ़ी 1897’ हमने 6 हवाई कैमरों का इस्तेमाल किया जो आम तौर पर फिल्मों में इस्तेमाल किए जाते हैं। हमने लद्दाख के अलावा आमगांव में भी इसकी शूटिंग की जो महाराष्ट्र और गुजरात की सीमा पर स्थित है। आज टीवी इंडस्ट्री में क्रांतिकारी बदलाव आया है क्योंकि अब वेब सीरीज भी मुकाबले में आ गई हैं। मेरा भतीजा तो गेम ऑफ थ्रोन्स को पूरी निष्ठापूर्वक फॉलो करता है।

21 सरफरोश: सारागढ़ी 1897 एक सीमित सीरीज है। क्या आप अब कोई डेली सोप करना चाहेंगे या फिर कोई रियलिटी शो होस्ट करना चाहेंगे?

जी बिल्कुल! एक एक्टर के तौर पर अलग-अलग किरदारों को एक्सप्लोर करना मेरा पेशा है। किसी भी एक्टर के लिए कोई किरदार पकड़ना मुश्किल है। इसी तरह मैंने गुल बादशाह के रोल के लिए वो खास बोली सीखी। मैं हर दिन को एक अलग किरदार निभाने के अवसर के रूप में देखता हूं और यही हमारे पेशे की सबसे बड़ी खूबी है।

आपने बहुत सारी रीजनल फिल्में की हैं और अब आप एक टीवी शो कर रहे हैं। क्या अब आपको इस बात की खुशी होती है कि आप पायलट ना बनकर एक एक्टर बने?

जी हां, मुझे एक्टर बनने के बाद वाकई बहुत खुशी होती है क्योंकि मेरी दिलचस्पी हमेशा से ही एक्टिंग में रही है। हालांकि मैं उत्तर प्रदेश में रायबरेली स्थित इंदिरा गांधी उड़ान एकेडमी नाम के एक पायलट ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट में भी गया। वहां मैं अपनी मिमिक्री और कॉमेडी के लिए फेमस था। मैं खास तौर से अमिताभ और विनोद खन्ना की मिमिक्री करता था। पायलट का कोर्स पूरा करने के बाद जब मुझे नौकरी मिलने में मुश्किल हो रही थी तो मैंने मॉडलिंग में अपनी किस्मत आजमाई। तब से मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

फिल्म इंडस्ट्री में अब आप और क्या प्रयोग करना चाहेंगे?

मुझे लगता है कि मुझे पहले ही वह शो मिल गया है। मैं ‘21 सरफरोश: सारागढ़ी 1897‘ में गुल बादशाह के अपने किरदार के साथ प्रयोग करूंगा।

आप कुछ और बताना चाहेंगे?

मैंने कभी एक्टिंग का प्रशिक्षण नहीं लिया और यह मेरी खुशकिस्मती रही है कि मुझे तनुजा चंद्रा और महेश भट्ट जैसे निर्देशकों के साथ अपना पहला ब्रेक मिला। उन्होंने ना सिर्फ मुझे अभिनय का मौका दिया बल्कि मेरी अभिनय प्रतिभा भी संवारी।