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सत्संग 

सत्संग 
वी.के. शर्मा  :

जब तुम अज्ञान से भर कर देखते हो तो वही संसार है। जब तुम ज्ञान से भर कर देखते हो तो वही मोक्ष है। क्यूँकि जीवन तो एक ही है। अगर जीवन में शांति, संतोष है, प्रेम है, किसी से कोई भेद भाव नहीं है, सब में तुम एक ही परमात्मा को देखते हो, तो संसार ही मोक्ष है। अगर जीवन में अशांति है, ईर्ष्या है, एक दूसरे से स्पर्धा(competition) है, प्रेम का अभाव (कमी) है, तो ये ही संसार है। धन कमाने के लिए कितना कष्ट उठाना पड़ता है, यह बात किसी धनी से ज़रा पूछना। वह ठीक तरह से ना सो सकता है, ना ठीक से भोजन कर सकता है, ना ठीक से हंस सकता है, ना ठीक से रो सकता है। तुम ऐसे धनवान बनने की चेष्टा मत करना। धन कमाने में कोई हर्ज नहीं है, पर इस देह को दाँव पे लगा कर, धन मत कमाना। तुम सोचते हो की ये धनी लोग पिछले जन्मों का कर्म भोग रहे हैं। पर इनसे पूछना- धनी अपने चेहरे पर बनावटी हँसी लेकर रहता है, शायद अपने भीतर के ज़ख़्मों को सम्भाले बैठा है। जो संसार में है, वह सोचता है की संसारी दुखों से मुक्त होने का एक ही रास्ता है, सन्यासी या महात्मा हो जाना। इसलिए तुम संसारियों को, धन-पतियों को, राज-नेताओं को, इन सन्यासियों या महात्माओं के चरणों में बैठे देखोगे। यह लोग ज्ञान की चर्चा सुनने गए हैं, सत्संग करने गए हैं। पर इन्हें वहाँ से भी ख़ाली हाथ ही लौटना पड़ता है, इनमे रत्ती भर भी कोई परिवर्तन या क्रांति नहीं होती है। सत्संग करने से या ज्ञान की चर्चा सुनने से कोई सुख या शांति मिलती तो बहुत ही सस्ता है, फिर तो प्रत्येक व्यक्ति सुख और शांति प्राप्त कर लेता। कुछ लोग रेटायर्मेंट को अभिशाप समझते हैं पर ऐसा नहीं है। रेटायअर्मेंट तो एक गिफ़्ट है, एक वरदान है, एक बून है जो प्रकृति ने हमें दिया है। रेटायअर कहना एक गाली के समान है। प्रकृति तुम्हें जीवन के आख़िरी श्वास तक रेटायअर नहीं करती है। प्रकृति तो हमें प्रोत्साहित करती है की पहली पारी समाप्त हुई है, अब दूसरी की तय्यारी करो। पहली पारी में तुमने अपने परिवार, समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन किया है, कोई अधिकार नहीं माँगा है। तुमने बख़ूबी अपने जिम्मेदारियाँ निभाई हैं, बड़ा परिश्रम किया है, ख़ूब भाग दौड़ की है। अब तुम पहली पारी सब ज़िम्मेदारियों से मुक्त हो। अब दूसरी पारी की शुरुआत करो। रेटायर्मेंट शब्द मन की ही उपज है क्यूँकि मन की भाषा ही नेगेटिव है। इस मन ने ही तुम्हें समझ रखा है की अब तुम रेटायर हो गए हो, अब तुम्हारे करने के लिए कुछ नहीं है, अब तुम जीवन की अंतिम घड़ियों का इंतज़ार करो। यह प्रकृति के नियमों के विरुद्ध है। प्रकृति तो तुम्हें जीवन के अंत तक जीने का मौक़ा देती है, कभी रेटायर नहीं करती है। इसलिए जिसने इस मन की ना सुनी, वह जीवन भर कभी रेटायर नहीं होता है। दूसरी पारी में तुम्हारे पास समय ही समय है की अपने शौक़ जो तुमने पहली पारी में पूरा ना कर सके, इस दूसरी पारी में पूरा कर लो। बशर्ते के तुम्हारा यह शौक़ प्रकृति के नियमों के विरुद्ध ना हो। दूसरी पारी में अपना जीवन नए सिरे से शुरू करो, प्रकृति (परमात्मा) का आशीर्वाद तुम्हारे साथ है।

प्रत्येक व्यक्ति कोई ना कोई धार्मिक क्रिया अवश्य करता है, जैसे पूजा-पाठ, हवन-यज्ञ, सत्संग, धार्मिक शास्त्रों का अध्ययन। इसी बहाने हम परमात्मा को याद करते हैं। फिर कोई बिरला ही यह जानने की कोशिश करता है की मैं कौन हूँ। कभी यह नहीं सोचता की क्या मैं शरीर हूँ, मन हूँ, बुद्धि हूँ, चेतना हूँ, काल हूँ, स्थान हूँ, या इसके अतिरिक्त भी कुछ और है। अगर आप यह जानना चाहते हैं आप कौन हैं, तो पहले आप को यह जानना चाहिए की आप क्या नहीं हैं और यह आप अपने मन के द्वारा ही जान सकते हैं। अपने मन से पूछते जाइए की मैं क्या हूँ। मन की भाषा नेगेटिव है। जब मन उन सब वस्तुओं को (reject) नकारता जाएगा, जो आपके इस मैं हूँ से मेल नहीं खाता, ध्यान रखना यह मैं आत्मा का धुँधला सा प्रतिबिम्ब (परछाईं) है, अंत में मन ऐसी स्तिथी में पहुँच जाएगा, जब तुम कहोगे की मैं अनंत हूँ, असीम (infinity) हूँ। आप के चारों और जो रूप वाले आकार हैं वे पाँच तत्त्व के बने हुए हैं, उन्मे आप भी हैं। ये सारे आकार परिवर्तन शील हैं, रोज़ बदल रहे हैं, अनित्य (टेम्परेरी) हैं, एक ना एक दिन नष्ट होने वाले हैं। इसलिए जो भी करना हैं इसी जीवन में करना है। तुम्हारे मन ने कल्पना से एक व्यक्तिगत (personal) संसार की रचना की है, और तुम इसी संसार में रहते हो, ना तो तुम इस अपने व्यक्तिगत संसार में किसी को अंदर आने देते हो, ना स्वयं ही इस संसार के बाहर जाते हो। इस तुम्हारे व्यक्तिगत संसार में, तुम्हारा सोचना, बोलना, करना, जानना, व्यवहार करना, सब मन की अवस्था के अनुसार होता है। और मन प्रति क्षण बदलता रहता है। इसीलिए तुम अशांत रहते हो और दुखी रहते हो। तुम अकेले ही अपने इस व्यक्तिगत संसार में बंद होकर रह गए हो। और सीमित हो गए हो।
फोटो :परमज्ञान.इन
वी.के. शर्मा द्वारा:फरीदाबाद ( हरियाणा )

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