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वृक्ष

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सूना  कर  डाला  मेरा  आंगन,
प्यासा  रहता  है  यहां  सावन।

धरती    बंजर  कोई    न  अंकुर,
हवा  चले    न    कोई    पावन।

आधी  सूख    गई    है  शाखाएं,
सूखे  से  घिर    गया  है  जीवन।

पर्यावरण      प्रदूषित      करके,
हवा  बहे  न    अब    मनभावन।

इधर  धरा  को  माँ  सम  पूजा,
खिला  खिला  है  सारा  उपवन।

रैन    बसेरा    हैं    पंछी    करते,
आनंद  में  उड़ते    नील    गगन।

शीतल    छाया    मेरे    तन  की,
व्यथा मिटा दे  हर  एक जन  जन।

पर्यावरण    प्रदूषित    मत  करना,
पछताओगे    फिर    सारा  जीवन।

प्रकृति      वैभव      से      भरपूर,
न्योछावर    है    तन    मन    धन।

नई      उम्मीदें      और    आशाएं,
खिलता  जहां  स्वच्छ    पर्यावरण।

जल    थल    नभ  है    जिम्मेदारी,
मुस्काएगा    आने    वाला      कल।

वृक्ष कमल
जालंधर

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