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रामजन्मभूमि का  विवाद  शांतिपूर्ण अंत हो गया, तुफ़ैल चतुर्वेदी

रामजन्मभूमि का  विवाद  शांतिपूर्ण अंत हो गया, तुफ़ैल चतुर्वेदी

तुफ़ैल चतुर्वेदी :

रामजन्मभूमि के पाँच सौ से अधिक वर्ष पुराने भयानक ख़ूनी विवाद का शांतिपूर्ण अंत हो गया। यहाँ यह प्रश्न विचारणीय है कि इस विवाद का पाँच सौ से अधिक वर्ष में कोई शांतिपूर्ण हल क्यों नहीं निकला ? यह शांतिपूर्ण निर्णय 1947 में भारत की खंडित स्वतंत्रता के बाद ही क्यों आ पाया ? इसका उत्तर है कि तब रामजन्मभूमि मंदिर तोड़ने वाले चिंतन के हाथ में तलवार थी और हमारे हाथ से तलवार छीनी जा चुकी थी। पाँच सौ से अधिक वर्षों में हमने पचासों बार जन्मभूमि वापस लेने के लिये प्रयास किये। हर बार हमारे रक्त से होली खेली गयी। हमारी गर्दनें काटी गयीं। जन्मभूमि वापस लेने के प्रयास में हमारे प्रतापी पूर्वज बलिदान हुए।

1947 में सैकड़ों वर्षों की ग़ुलामी के बाद इस्लाम, अँगरेज़ शासन और कांग्रेस ने भारत माँ के हाथ काट कर पाकिस्तान बना दिया और शेष स्वतंत्र हुआ भारत उस रूप में इस्लामी दबदबे का नहीं रहा तो प्रभु राम के वंशजों, भक्तों ने जन्मभूमि का मंदिर में उपासना वापस शुरू की। तुरंत अयोध्या से 3 किलोमीटर दूर के फ़ैज़ाबाद के सड़कछाप आदमी हाशिम अंसारी ने रामजन्मभूमि के मंदिर को दुबारा मस्जिद बनाने, पूजा रोकने, उसमें नमाज़ पढ़ने की अनुमति को ले कर कोर्ट में याचिका डाल दी। प्रभुराम की जन्मस्थली पर बनी मस्जिद जन्मस्थान पर ताले डाल दिए गये। हम विवश, भीगी आँखों से बाहर बने चबूतरे पर पूजा करते रहे। हम प्रभुराम की जन्मस्थली में न जा पाएं इसके लिए फटीचर हाशिम अंसारी न जाने कैसे बरसों मुक़दमा लड़ता रहा। वो मर गया तो उसका बेटा इक़बाल अंसारी पक्षकार बन गया।

जो विचारधारा संसार भर में दूसरे मतावलम्बियों के उपासना स्थल तोड़ती फिरती रही है, ने तलवार हाथ में न होने पर कोर्ट का रास्ता अपना लिया। 1947 के बाद भारत में इस्लामी सत्ता नहीं रही तो दूसरे मार्ग का उपयोग किया गया। लक्ष्य वही था कि इस्लाम के अतिरिक्त किसी भी अन्य विचारधारा, पूजा पद्धति को येन केन प्रकारेण नष्ट कर दिया जाये। जिहाद के सैकड़ों तरीक़े हैं। अबके तलवार न सही कोर्ट ही सही। अब 70 वर्ष की लंबी क़ानूनी लड़ाई के बाद रामजन्मभूमि के मंदिर बनने का मार्ग प्रशस्त हुआ।

बहुत से बल्कि विशेष रूप से कोंग्रेसी, वामपंथी, सपाई, बसपाई, ललुआई लोग कहते हैं कि जिस स्थान को बलपूर्वक लिया जाये वहां मस्जिद नहीं बनायी जा सकती। उनसे कोई बताये कि मक्का जो उस समय अरब क्षेत्र का बहुत प्रतिष्ठित मंदिर था, से स्वयं मुहम्मद ने 360 मूर्तियां तोड़ी थीं और उसे मस्जिद में बदला था। यह तोड़फोड़ सदैव से संसार भर में इस्लाम का है।

यह जानना चाहिये कि इन 70 वर्षों में हाशिम अंसारी, इक़बाल अंसारी का हिन्दुओं के साथ जीवन कैसा रहा ? एक पत्रकार के प्रश्न पूछने पर, स्थानीय हिंदुओं और महंतों के साथ आपका रिश्ता कैसा रहा है? उसी के शब्दों में ” हमारे बहुत अच्छे संबंध हैं। अयोध्या की संस्कृति शेष विश्व के लिए एक उदाहरण है। हिंदू बहुत दयालु हैं। हम एक साथ बहुत शांति से रह रहे हैं। मेरे पिता का कुछ महंतों के साथ बहुत अच्छा रिश्ता था। उदाहरण के लिए, महंत ज्ञान दास और मेरे पिता एक ही कार में, एक ही केस के लिए अदालत में जाते थे।

जिस व्यक्ति के कारण हिन्दुओं को प्रभु राम की जन्मभूमि पर जाने का अवसर नहीं मिला, उस व्यक्ति से संबंध विच्छेद करने, उससे शत्रुता मानने की जगह महंत ज्ञानदास और उस तरह के लोगों ने उससे मित्रता रखी ? कई समाचारपत्रों में यह रिपोर्ट भी आयी है कि इन दुष्ट बाप-बेटों को हिन्दुओं ने भी मुक़दमा लड़ने में सहायता दी। विश्वास नहीं होता कि यह सत्य होगा मगर यदि ऐसा है तो हमारे सोचने का विषय है कि हम हिंदुस्तान में हिन्दू रहना भी चाहते हैं या नहीं ?

प्रभु राम की जन्मभूमि का मंदिर जिस नीच के कारण 70 वर्ष बनने से रुका रहा, उस माँसाहारी म्लेच्छ से हमारे महंत त्रिपुण्ड लगा कर , प्रभु राम की पूजा कर, तुलसा दल-चरणामृत पान कर गले मिलते रहे ? इन्हें प्रभुराम के भव्य मंदिर बनने के मार्ग में रोड़ा डालने वाला नहीं दिखाई दिया ? मैं यहाँ यह कहने की सोच भी नहीं सकता कि “हे प्रभु इन्हें क्षमा कीजिये। यह नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं” बस यह प्रार्थना कर सकता हूँ कि इन महंतों के, इस दुष्ट को दान देने वालों के, इसका मुक़दमा लड़ने वालों के कीड़े न पड़ें, यह सड़-सड़ का न मरें। आख़िर प्रभु इन्होंने अजामिल की तरह सही किन्तु आपका नाम जपा है।

तुफ़ैल चतुर्वेदी  tufailchaturvedi@gmail.com

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