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मैं स्वयं को ठगा सा अनुभव कर रहा हूँ विनय कृष्ण चतुर्वेदी “तुफ़ैल”

मैं स्वयं को ठगा सा अनुभव कर रहा हूँ विनय कृष्ण चतुर्वेदी "तुफ़ैल"

मैं स्वयं को ठगा सा अनुभव कर रहा हूँ। रामजन्मभूमि मंदिर निर्माण की नींव रखने के लिये भारत के 130 करोड़ लोगों में से 200 लोगों को चुनना तय किया गया है और उनमें फ़ैज़ खान, इकबाल अंसारी, सुन्नी वक्फ बोर्ड के लोग रखे गए हैं। ये न रखे जायें, इसका विरोध करने वालों को पुलिस द्वारा पकड़ कर घर, मंदिर में स्थानबद्ध किया जा रहा है।

रामजन्मभूमि मंदिर मंदिर का निर्माण की घड़ी मेरे जैसे लाखों लोगों के लिये आँखें भर आने की घड़ी है। सैकड़ों वर्षों से हम अपने आराध्य की जन्मभूमि पर पूजा कर पाने की ललक संजोये हुए थे। विदेशी आक्रमणकारियों ने मज़हबी निर्देशों के कारण एक प्रभु राम का मंदिर ही नहीं हज़ारों मंदिर तोड़े। हमारे विश्वविद्यालय, पुस्तकालय जलाये। हमारे आचार्यों की हत्याएं कीं। हमारी स्त्रियों को भोगदासी बना कर बाज़ारों में बेचा। हमें हर प्रकार से अपमानित कर जज़िया वसूला। हम लड़े, पराजित हुए, फिर लड़े। यह क्रम तब तक चलता रहा जब तक कांग्रेस, मुस्लिम लीग और अंग्रेज़ों के हाथों 14 अगस्त 1947 में हमारी मर्मान्तक पराजय पाकिस्तान बनने की शक्ल में नहीं हो गयी।

शेष बचे भारत में हमने 1949 में फिर से प्रयास किया। विवादित ढांचे में प्रभु राम का विग्रह प्रकट हुआ। प्रधानमंत्री नेहरू और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविन्द बल्लभ पंत ने जन्मभूमि मंदिर में  ताले डलवा दिए और दर्शन, पूजन से रोक दिया। राष्ट्र ने जन्मभूमि मुक्ति का आंदोलन छेड़ा। 1990 में हमने मुलायम सिंह के निर्देश पर गोलियां खायीं और 1992 में बाबरी कलंक से मुक्ति पायी। हमारे पूज्य स्थानों के ध्वस्त करने की यह कोई एक घटना नहीं थी। अफ़ग़ानिस्तान से पाकिस्तान, भारत होते हुए बांग्ला देश में ऐसी हज़ारों मस्जिदें हमारे पूज्य स्थानों पर खड़ी हैं। ऐसा नहीं है हमारे मंदिरों के ध्वस्त करने वालों को हमने पराजित नहीं किया। सैकड़ों लड़ाइयों में हमने उनकी खाट खड़ी की। अंततः भारत के अंग्रेज़ी शासन के क्षेत्र अंग्रेज़ों ने हिन्दुओं से ही जीते थे। 1857 से पहले ही दिल्ली की मुग़ल सत्ता का बिस्तर हमने ही गोल किया था।

जानकारी के लिए निवेदन करता चलूँ कि 11 सितम्बर 1803 में दिल्ली के क़ब्ज़े के लिये युद्ध दौलत राव सिंधिया के नेतृत्व वाली मराठा सेनाओं और जनरल लेक के नेतृत्व वाली अंग्रेज़ी सेनाओं के बीच हुआ था। मुग़ल बादशाह को तो मराठे कब के उसके दरबार में ही औरतों के कपड़े पहना कर नचा चुके थे। उसकी स्थिति तो भूमिपुत्रों के लिये एक विदेशी मूल के हिजड़े जैसी ही थी। आइये विचार करें कि अनेक विजयों के बाद भी ऐसा क्यों हुआ ? कुछ प्रमुख उदाहरणों से बात करते हैं।

हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप की सेनाओं के केंद्रीय भाग यानी हरावल दस्ते में पठानों का सैन्य हाकिम ख़ान सूर ने नेतृत्व में बहुत वीरता से लड़ा। मुगल सेनाएँ भाग खड़ी हुईं। अफ़ग़ानिस्तान तब धर्मभ्रष्ट हुए हिन्दुओं का ही स्थान था। पठानों का लगाव हमसे था। राणा जी ने अपने राज्य के हाकिम ख़ान सूर और ऐसे ही अन्य बंधुओं की घर वापसी नहीं की। तब ऐसा हो गया होता तो राजस्थान, सिंध, गुजरात की वर्तमान इस्लामी समस्या का तभी समाधान हो गया होता।

1757 में पेशवा रघुनाथ राव के नेतृत्व में मराठा सैन्य ने दिल्ली पर क़ब्ज़ा किया। अन्ताजी मुक्तेश्वर दिल्ली प्रान्त के गवर्नर नियुक्त हुए। दिल्ली जीत कर भी मराठों ने मुग़ल दुष्टताओं को नष्ट नहीं किया। क़ुतुब मीनार जाइये। उस के प्रांगण में कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद खड़ी है। जिस पर बोर्ड लगा है कि यह मस्जिद 27 जैन व हिंदू मंदिरों को नष्ट कर उनके मलबे से बनाई गयी है। यह मस्जिद दिल्ली पर मराठा क़ब्ज़े के समय भी थी। इसे और ऐसी हर मस्जिद को ध्वस्त कर दिया जाना चाहिये था मगर नहीं किया गया। विदेशियों के हाथो धर्मभ्रष्ट हुए लोगों को वापस नहीं लिया गया। धर्मभ्रष्ट करने के केन्दों, चिंतन को नष्ट नहीं किया गया।

1783 में जनरल बाबा बघेल सिंह, जनरल जस्सा सिंह रामगढ़िया, जनरल जस्सा सिंह अहलूवालिया के नेतृत्व में हम ने दिल्ली जीती। मुग़ल शासक से गुरुओं से संबंधित स्थान गुरूद्वारे बनाने के लिये माँगे मगर उस पिशाच व्यवस्था को जिसने गुरु तेग बहादुर की हत्या की, उनके साथियों को खौलते तेल में तला, बंदा बैरागी की हत्या की, गुरुओं के बच्चों को दीवार में जीवित चुना, नष्ट नहीं किया। उसी परम्परा का इमाम बुख़ारी आज भी दिल्ली में है। वो ख़ानक़ाहें, दरगाहें, मदरसे तब भी थे मगर मुग़ल सत्ता की खाट खड़ी करना पर्याप्त समझा गया। उसकी जड़ें उखाड़ने की कोई कोशिश नहीं हुई।

छत्रपति शिवजी ने हिंदू पदपादशाही की स्थापना की मगर इस्लामी सत्ता के चिन्ह मदरसों, मस्जिदों को नष्ट नहीं किया। इस चिंतन की पुस्तकों को नहीं जलवाया, धर्मभ्रष्ट हुए लोगों की घर वापसी नहीं की। परिणाम यह निकला कि वैचारिक नागफनी फैलती गयी। आज औरंगाबाद, जालना, पुणे, नागपुर, कोल्हापुर, मुंबई की इस्लामी आक्रामकता इस लिए है कि इसे नष्ट करने का बड़े पैमाने कोई प्रयास कभी हुआ ही नहीं। संघ के प्रथम सरसंघचालक जी जीवनी पढ़िए। उसमें विवरण है कि उन्होंने नागपुर में इस्लामी जुलूस की आक्रामकता से निबटने के लिये दंड प्रहार की तकनीक प्रयोग की। छत्रपति यदि हिन्दुपदपादशाही की स्थापना के साथ इस्लामी चिंतन, व्यवहार की छान-फटक करते, बदलाव करते तो क्या इस्लामी आक्रामकता के हाथों महाराष्ट्र की आज जैसी दुरावस्था होती ?

सोचिये कि महाराजा रंजीत सिंह की राजधानी लाहौर आज पाकिस्तान का शहर कैसे बन गया ? उन्होंने इस्लामियों के हाथों गंवाए गये बड़े क्षेत्र को वापस जीता। सिख साम्राज्य की स्थापना की मगर शत्रु की विचारधारा को को चिन्हित नहीं किया। बदला लेने की बात क्या, उसे नष्ट करने की बात सोची तक नहीं परिणाम निकला कि उस महान साम्राज्य का बड़ा भाग आज शत्रुओं के हाथों में है।

हम हिन्दू व्यक्ति बन कर रह गए हैं। विवाह की हद तक जाति हैं मगर एक धर्म ध्वज के नीचे खड़े नहीं हैं। वो कैसे होगा ? इसका उपयुक्त तरीक़ा शत्रुओं को चिन्हित करना, उनसे निबटने की योजना बनाना, उसे कार्यरूप में परिणित करना है। हमें प्रभावी, शक्तिशाली होते ही शत्रु को क्षमा कर देने का रोग है। बिना यह देखे, जाने कि शत्रु क्षमा मांग भी रहा है ?

रामजन्मभूमि संस्थान की जानकारी में यह तो होगा ही कि हाशिम अंसारी वो चांडाल है जो जीवन भर प्रभु राम का मंदिर न बनने देने के लिए कोर्ट में खड़ा रहा। रामजन्मभूमि का जीवन भर मुक़दमा लड़ने वाले महंत रामचंद्र परमहंस इस बला के मूर्ख थे कि हाशिम अंसारी को अपने साथ रिक्शे पर कोर्ट ले जाते रहे। उन्हें कभी नहीं सूझा कि यही राक्षस उनके और प्रभु राम के मंदिर के बीच खड़ा है। उसके बाद उसका हरामी बेटा इक़बाल अंसारी मुक़दमा लड़ता रहा। सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड ने भी प्रभुराम का मंदिर न बने इसकी लड़ाई लड़ी। अब उन्हें शिलान्यास में बुला कर इसका इनआम दिया जा रहा है। 1990 में अयोध्या की गोली वर्षा में मैं जो मरते-मरते बचा आज अयोध्या नहीं जा सकता। आज अयोध्या जाने की बारी प्रभु राम के शत्रुओं की भी है।

विनय कृष्ण चतुर्वेदी “तुफ़ैल”  

tufailchaturvedi@gmail.com

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