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मुसाफिर 

मुसाफिर

मुसाफिर   

सैलानी मुसाफिर,

क्या मंजिल की है तुझे खबर,

बस जिए जा रहे है,

सफर को ख़तम किये जा रहे है। 

कहाँ जाना हैं कहाँ ठिकाना हैं,

क्या कभी सोचा कभी जाना हैं,

जो श्वास रही हैं,

बस लिए जा रहें हैं,

सफर को ख़तम किये जा रहे हैं। 

जीने की वजह की खबर ही नहीं हैं,

इरादों पर भी अपने नज़र नहीं हैं,

जो दिल में आया किये जा रहे हैं,

सफर  को ख़तम किये जा रहे हैं। 

जो दूसरों के जीने की बने वजह,

खिले फूल बनकर इस चमन में,

मुबारक हैं उन्हीं का जीना,

वही सफर जिए जा रहे हैं। 

स्वरचित

मीनाक्षी भास्कर

जालंधर, पंजाब। 

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