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प्रकृति

प्रकृति
दिनकर जब उजियारा करता
सारी  सृष्टि    चल  पड़ती,
जीव  जंतु  और  कीट पतंगे
निज नित कार्यों में जुड़ती,
जीवन का घट गया एक दिन
आने    वाले    कल    से,
फिर भी अनगिनत खयालों में
जीवन कश्ती जाए खिंचती।

सोचने  की    शक्ति  का
दुरुपयोग अक्सर करते रहते
व्यर्थ  के  ख्याली  पुलाव
मस्तिष्क  में हर  पल पकते,
कल की चिंता में व्यथित मन
असंख्य  भावों  को पिरोता,
जब  नहीं  पल  का  भरोसा
बोझ  भारी फिर क्यों ढोते।

जब तलक न लक्ष्य हासिल
कर्म  पथ  पर चलना होगा,
रास्तों  की    ठोकरें    को
तोड़कर  ही  बढ़ना  होगा,
हँस  पड़ेगी  जिंदगी फिर
पहुंच  मंजिल  के  किनारे,
जीत हासिल के लिए फिर
उत्साह  उमंग  भरना होगा।

प्रकृति का हर एक कण कण
एक  दूसरे पर  है  समर्पित,
है  किसी  पर  कोई आश्रित
और किसी पर कोई अर्पित
एक आकर्षण  से खिंचे सब
रहते  अपनी  ही  परिधि में
देख आलोकिक शक्तियौं को
हृदय  होता  और  गर्वित।

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