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प्रकाश

प्रकाश
प्रकाश
सूरज के उज्जवल प्रकाश से
खिल जाते उपवन के पुष्प
भँवरे गुंजन करते उन पर
इतराते मन के अनुरूप
खिली धूप में निखरा जाए
अनुपम रूप सुहाना उनका
अंगड़ाई भरते मतवाले
मुस्काए सब के स्वरूप।
गयी कालिमा हुआ प्रकाश
भय का साया चला गया
धवल प्रकाश से चमके अवनि
सारा गुलशन जगमगा गया
सारी सृष्टि अपने ढंग से
व्यस्त प्रतीत सी होती
दिनकर की सुनहरी किरणों से
धरा का मुख चमचमा गया।
सत्यता के उज्जवल प्रकाश से
अंतर्मन सब उजला हो जाए
बैर द्वेष नफरत और हिंसा
धूल धूसरित हो जाए
मन का शीशा सदा ही रखना
निर्मल शीतल गंगा सा
जो देखे वो तुमको चाहे
सुध बुध अपनी खो जाए।
प्रकाश कमल भास्कर 

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