Home » पेड़ की व्यथा*
Entertainment

पेड़ की व्यथा*

पेड़ की व्यथा*

यह  कैसा    मैंने    जीवन    पाया,
सूख  गई    मेरी    कंचन    काया,
पक्षाघात  हुआ  मेरे    अंग    पर,
आधा    तन    मेरा      मुरझाया।

सूख  गई    मेरी  रक्त  शिराएं,
मुरझा  गई जीवन  की सब राहे,
देख  रहा  हूं  विक्षिप्त  तन को,
कैसे  अपना  ये  रोग  मिटाएं।

बंजर    हो    गई  धरती  सारी,
सूखे  की  लग    गई    बीमारी,
विषाक्त भूमि  पर न  कोई अंकुर,
मरुस्थल  बन  गई  भूमि हमारी ।

ज्यादा  धन  का लालच आया,
भूमि  में  विषाक्त    मिलाया,
अब  पछताने  से  क्या  होगा,
जब  घातक  तत्वों ने जलाया।

उधर  धरा  सिंचित  है जल से,
पौष्टिक    तत्वों  के  बल  से,
अपना तन विकसित कर पाया,
बचा लिया  अनहोनी  कल  से।

आशाओं  के  बाग  खिले  हैं,
हवाओं  के  भी  राग  छिड़े हैं,
पंछियों की टोली नील गगन में,
इतराते  गाते    उड़े  फिरे  हैं।

पवन  जहां  मुस्काती  गाती,
पत्ती  पत्ती खिल  खिल जाती,
मेरे  तन  की  शीतल  छाया,
तेरे  जीवन  को  अति  भाती।

आओ  सब  मिलकर  कुछ सोचे,
हर  बुरे  व्यवहारों  को अब रोके,
दूषित  न    हो    कंचन    भूमि,
पर्यावरण      प्रदूषण      रोके।

मीनाक्षी
जालंधर

All Time Favorite

Categories