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पर्वत/शिखर

पर्वत/शिखर आ जाना तुम मिलने प्रीतम पर्वत के उस पार अनगिनत पुष्प बेचैन हो रहे हैं देने को उपहार आच्छादित  हिम  शिखर अद्भुत छटा  बिखेरे सारी सृष्टि में फैला है असीम अनश्वर प्यार।

पंछी इतराते उड़ फिरते स्वच्छंद  विचरते रहते झरने निर्मल  जल लेकर  अविरल बहते रहते सोंधी सोंधी खुशबू  वाली झूमे पवन निराली मतवाले भंवरें  फूलों से मकरंद  ढूंढते फिरते।

सूर्य किरण सेधरा सुंदरी स्वर्णिम खिल जाती हरियाली की ओढ़ चुनरिया दुल्हन बनशर्माती वर्षा की बूंदों की ध्वनि गुंजित ज्यों पैजनिया हर्षित मन आंगन की कली कली खिल जाती.
पर्वत/शिखर कमल
जालंधर

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