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दीवानी चाहत

दीवानी चाहत

ढूंढ  रही  नंद के  लाला  को  राधा वृंदावन में
न जाने कैसी मनमोहन प्रीत जगा गया मन में

प्रीत की  रीत दिखाई कैसी सुध बुध भूल गई
ना देखूं  तो हो जाए बेचैनी  रहे सदा सपनन में

अपने रंग में रंग दिया मुझको ऐसी लग गई प्रीत
लोक लाज व्यवहार भूली चली अकेली बन में

बंसी मधुर बजाए नटखट  पागल  मनवा डोले
बलिहारी छवि देखन  घर  से निकली क्षण में

ना जाने कैसा रोग लग गया  मन को मेरे भारी
जैसे  कोई बैठ गया खुद ही मेरी  अखियन  में

टेसू के रंग की भर पिचकारी डारे मुझ पर रंग
सप्तरंगी  आभा फैली  ज्यों इंद्रधनुष गगन में

नख से शिख तक भिगो दिया प्यारे साँवरिया ने
भाग रही में आगे और पीछे बनवारी गलियन में

तरस  ना खाए  हैं  बेदर्दी  पकड़े  मेरी  कलाई
हाथ छुड़ा के भागना चाहूं पर चाहूँ हर जन्म में

ग्वाल बाल निकले सब भर के  रंग की झोली
रंग उड़ाए फाग  सुनाएं सुख  पाए हरिदर्शन में

मोहक छटा नूरानी चेहरा है  मनमोहन  सबका
इतनी सी बस चाहत मेरी जगह मिले चरनन में
कमल
जालंधर

फोटो :साभार :dostikasubhaarambh

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