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जाल

जाल
प्रीत का बंधन  ऐसा  बांधा
न  जाने  कब हुआ  कमाल
जितना निकलूँ फँसता जाता
रेशम के धागों का यह जाल।

प्रेम  जाल  का  ताना-बाना
हर  धागे  में  अद्भुत  शान
अब अपनी पहचान बन गया
प्रीत    रीत  का  करम  महान।

कुदरत ने एक जाल बिछाया
कब  फँस  जाए  कोई  जान
तेरे आगे  नतमस्तक हम सब
जैसे  चाहे  तूँ  रख  भगवान।

खिला खिलाया फूल गुलाब का
तोड़  लिया  क्यूँ  तूने  चुपचाप
हम  सब  की  आँखो  का  तारा
अपना  भी  था  अटूट  मिलाप।
जाल   कमल
जालंध

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