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किसान बिल लाया कृषि में ऐतिहासिक क्षण

किसान बिल लाया कृषि में ऐतिहासिक क्षण  

जब भी कोई परिवर्तन लाया जाता है तो निश्चित रूप से संदेह और अनिश्चितता का वातावरण पैदा हो जाता है क्योंकि इस में यथास्थिति का संतुलन बिगड़ जाता हैं और यदि यथास्थिति युगों से चली आ रही हो तो संदेहवाद एक दृढ़ चुनौती में बदल जाता है। ऐसा ही नजरिया  विपक्षी दल ने उन तीनों विधेयकों के समक्ष रखा है जो मोदी सरकार ने किसानों को सदियों पुरानी शोषणकारी व्यवस्था से छुटकारा दिलाने के तहत पारित किया है। इन बिलों का उद्देश्य किसानों को सशक्त बना कर उन्हें इस योग्य बनाना है कि वे बिचौलियों पर निर्भर रहने के बजाय अपनी उपज के बारे में निर्णय लेने में अधिक सक्रिय भूमिका निभा सके

कई दशकों से किसान मंडियों और बिचौलियों (आढ़तियोंकी शोषणकारी व्यवस्था में फसे हुए हैं जिन्होंने कभी भी उन्हें अपनी उपज के लिए पर्याप्त पारिश्रमिक मूल्य नहीं दिया। उनकी वार्षिक आय भी वर्षों से बढ़ी नहीं है यहां तक उनमें से सैकड़ों ने भारी ऋणग्रस्तता के आगे घुटने टेक दिये हैं। इस उदास माहौल में संसद द्वारा अधिनियमित किए गए तीन विधेयकों से हमारे देश के ग्रामीण गलियारों में एक नयापन आने की उम्मीद है और देशभर के किसानों के लिए यह एक ऐतिहासिक क्षण साबित हो सकता है।

गौरतलब है कि तीनों बिल कृषक उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सरलीकरण) विधेयक 2020कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा करार विधेयक 2020 और आवश्यक वस्तु (संशोधनविधेयक 2020 ने मौजूदा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपीऔर कृषि उपज विपरण समिति (एपीएमसी) की व्यवस्थाओं के साथ कोई छेड़छाड़ भी नहीं की है। यह सिर्फ इतना है कि किसानों को कुछ और विकल्प दिए गए है।

कृषक उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सरलीकरण) विधेयक 2020 किसानों को अधिसूचित कृषि उपज विपणन समिति बाजारी मंडियों से बाहर अपनी फसल बेचने के लिए आजादी देने का प्रयास करता है। इसका उद्देश्य प्रतिस्पर्धी वैकल्पिक ट्रेडिंग के माध्यम से पारिश्रमिक कीमतों को सुविधाजनक बनाना है। ध्यान रखने वाली बात ये है कि यह विचार कृषि उपज विपरण समिति (एपीएमसी) को बंद करने के लिए नहीं है बल्कि एक किसान की पसंद का विस्तार करने के लिए है। इसलिए यदि कोई किसान मानता है कि कुछ अन्य निजी खरीददार के साथ बेहतर सौदा संभव है तो एपीएमसी मंडी में बेचने के बजाए इस विकल्प को ले सकता है।

किसानों की दुर्दशा को सुधारने में इस बिल के काफी मददगार साबित होने की उम्मीद है क्योंकि मंडियों और बिचौलियों की भूमिका काफी समय से किसानों को एक दुष्चक्र में बांध रही है। आढ़तियों की दया का पात्र बनते किसान शायद ही उनसे परे एक जीवन की कल्पना कर सकें। विधेयक उन्हें बिचौलियों के चंगुल से निकलने में मदद करेगा और उन्हें अपनी उपज के विपरण के लिए नये सिरे से सोचने की आजादी देगा।

कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा करार विधेयक 2020 किसानों को भविष्य में कृषि उपज की बिक्री के लिए कृषि व्यवसाई फर्मोंप्रोसेसरथोक विक्रेताओंनिर्यातकों के साथ एक अनुबंध में आने का अधिकार देता है। इसके अंतर्गत यदि किसान कंपनी के साथ अनुबंध पर हस्ताक्षर करता है तो कंपनी बताएगी कि वह पारिश्रमिक मूल्य के बदले क्या चाहती है। यह किसानों से प्रयोजकों की ओर बाजार की अप्रत्याशितता के जोखिम को स्थानांतरित करना चाहता है। इससे किसानों को आधुनिक तकनीक और बेहतर इनपुट सुविधा मिलने की उम्मीद है।

खेती के क्षेत्र में सबसे ज्यादा चिंताजनक कारणों में से एक यह रहा है कि किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कृषि उपज के प्रसंस्करणमूल्य संवर्धन और विपरण और व्यापार पर कोई विचार नहीं किया गया था। देश में कुल कृषि उपज का केवल प्रतिशत प्रसंस्करण के लिए जाता है जो कि अमेरिका सहित अन्य देशों की तुलना में कम है जहां यह 50 प्रतिशत है।

आवश्यक वस्तु (संशोधनविधेयक 2020 में असाधारण परिस्थितियों जैसे कि युद्धअकाल या कोई और प्राकृतिक आपदा को छोड़कर आवश्यक वस्तुओं की सूची से अनाजदालतिलहनप्याज और आलू जैसी वस्तुओं पर स्टॉक होल्डिंग सीमा लगाए जाने की प्रक्रिया को खत्म करना शामिल है।

सभी तीन विधेयकों को लाने का विचार खेत बाजारों का उदारीकरण करने की उम्मीद से किया गया है। ऐसा करने से प्रणाली अधिक कुशल हो जाएगी और सभी संबंधित लोग विशेषकर किसानों के लिए बेहतर मूल्य प्राप्ति होगी। चिंता का विषय यह है कि भारतीय खेती को अभी से अधिक पारिश्रमिक उद्यम बनाना है। विधेयकों ने समझौतों पर एक रूपरेखा तैयार की है जो किसानों को उत्पादन की सेवाओं और बिक्री के लिए कृषि-व्यवसाय कंपनियोंनिर्यातकों और खुदरा विक्रेताओं के साथ सीधे जुड़ने की अनुमति देती है। यह सब भारत के मेहनती किसानों को आधुनिक तकनीक तक पहुँच प्रदान करके प्राप्त होगा।

न्यूनतम समर्थन मूल्य के बारे में बहुत सी गलत जानकारी फैलाई जा रही है। किसानों के बीच एक डर की मनोविकृति पैदा की जा रही है कि बिलों के पारित होने के साथ एमएसपी को खत्म कर दिया जायेगा। प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी और केन्द्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर दोनों ने किसानों को आश्वासन दिया है कि एमएसपी हमेशा की तरह जारी रहेगा और इसकी फिर से पुष्टि की गई क्योंकि केन्द्र ने आगामी फसलों के लिए एमएसपी की घोषणा इस साल पहले ही कर दी थी।

कुछ वर्गों ने यह आशंका जताई है कि खाद्य सुरक्षा से समझौता करउचित समय पर भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) को समाप्त कर दिया जायेगा जो कि फिर से एक गलत अवधारणा है क्योंकि तीनों विधेयक व्यापार बाधाओं को हटाने और कृषि उपज के डिजीटल व्यापार की अनुमति देने के लिए है और किसी भी कीमत पर यह राष्ट्र की खाद्य सुरक्षा के साथ समझौता नहीं किया जायेगा।

नये कृषि विधेयकों पर करीबी नजर डालने से यह आश्वस्त होगा कि यह किसानों के सशक्तिकरण की दिशा में एक कदम है और आलोचकों को पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण से ऊपर उठना होगा।

*अजय भारद्वाज : (* लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार है)

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