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‘उलझने’

 

,'उलझने'

उलझन भरी जिंदगी कभी जीने नहीं देगी

गम के  आंसूओं को कभी पीने नहीं  देगी,

उलझन को जितनी जल्दी हो सुलझा लो,
ये तुम्हारे जख्मों को कभी सीने नहीं देगी।

उलझन  से बिखर  जाएगा  तेरा घर  बार,
ढूंढे से भी न  मिल  पाएगा  जरा सा प्यार,

जन्नत की खुशी  मिल जाएगी  एक  दिन,
तोड़  ही  दो  दिलों में  जो बनाई है दीवार।

उलझन  से  कभी  न कोई  काम  बने हैं,
आपस  में ही  एक  दूसरे  से  सब ठने हैं,
सुलझा  लो  उलझनें  चाहत  की मदद से,
वरना  गम के  बादल  हरदम  यह  घने हैं।

उलझन  कोई सताए  तो गीत  गुनगुनाओ,

सबके  हृदय में ज्योति  प्रीत की  जलाओ,

सुलझा  लो  सभी  जीवन  की ये  उलझने,
सबको  गले  लगा जश्न-ए-जीत  मनाओ।

'उलझने' कमल,जालंधर.

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